वीरगति दिवस पर विशेष : नायक मोहन सिंह, सेना मेडल (Sena Medal) (मरणोपरांत) की अद्भुत वीरता और बलिदान

यहाँ से जानिए, नायक मोहन सिंह, सेना मेडल (Sena Medal) (मरणोपरांत) की अद्भुत वीरता और बलिदान का परिचय ...🌹 

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🚺 वीरगति दिवस देश के उन शूरवीरों को श्रद्धांजलि देने का दिन हैजिन्होंने अपने देश के नाम सर्वोच्च बलिदान दिया। इतिहास में ऐसे अनेक वीर जवान हुए हैंजिनकी कुर्बानी आज भी हमें गर्व और चेतना का एहसास कराती है। उनमें से एक प्रसिद्ध नाम है नायक मोहन सिंह काजिन्होंने 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में सेना मेडल (मरणोपरांत) जीतकर अपनी अमर वीरता का परिचय दिया।

🚺 दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं एक वह जो केवल दिन भर अपने में ही व्यस्त रहते  हैं, अपने बारे में ही सोचते हैं,  बेशक उनकी सोच से किसी का कितना ही नुकसान क्यों न हो जाए और दूसरे वह लोग होते हैं जो यह सोचते हैं कि मन, वचन और कर्म से किसी को परोक्ष या अपरोक्ष रूप से पीड़ा न पहुंचे, लेकिन यह दूसरी तरह के लोग गलत और अन्याय के खिलाफ भी उतनी ही शिद्दत से लड़ते हैं जो कि एक  इतिहास बन जाता है। इसी तरह की सोच रखने वाले नायक मोहन सिंह  ने 1971 के युद्ध में वह अपूर्व वीरता दिखाई जो की सेना के इतिहास में एक मिसाल है।

नायक मोहन सिंह, Sena Medal (मरणोपरांत) और 1971 का युद्ध : 

👉🏅 सन् 1971 के भारत पाकिस्तान के बीच हुए युद्ध में हमारी सेना ने दो मोर्चों - पूर्वी और पश्चिमी पर युद्ध लड़ा। ब्रिगेड ऑफ द गार्ड्स की 5 गार्ड्स रेजिमेंट पूर्वी मोर्चे पर युद्ध लड़ रही थी । 05 दिसंबर 1971 को इस यूनिट को उत्तर नारायणपुर में चौड़ंगा - झेनिडा सड़क मार्ग पर एक सड़क अवरोध स्थापित करने का काम सौंपा गया ।  रात लगभग 2330 बजे 5 गार्ड्स के सैनिकों द्वारा उस सड़क मार्ग पर अवरोध स्थापित कर दिया गया । इस सड़क अवरोध को दो उद्देश्यों के लिए स्थापित किया गया था । पहला दुश्मन को सड़क मार्ग से तेजी से आगे बढ़ने से रोकना और दूसरा  दुश्मन के वाहनों के काफिले पर दूर से हमला कर उनको नुकसान पहुचना।

👉🏅 नायक मोहन सिंह लाइट मशीन गन सेक्शन के सेक्शन कमांडर थे। उनके सेक्शन की  जिम्मेदारी थी कि जैसे ही दुश्मन के वाहन का काफिला  "किलिंग ग्राउंड" के रूप में चिन्हित क्षेत्र में प्रवेश करें, और उनके ऊपर कार्यवाही  होने पर वह पीछे मुड़कर भागें तो वहां से भागने ना पायें यानि कि उनका एल एम जी सेक्शन एक रोक का काम करेगा। सड़क पर जो अवरोध स्थापित किया गया था उसके आसपास तैनात सैनिक एकदम सतर्क थे । चौड़ंगा की तरफ से चलकर झेनिड़ा की ओर जाने वाला पाकिस्तानी सेना की छह सैनिक गाड़ियों का एक काफिला दिखाई पड़ा । इस काफिले की गाड़ियाँ दूर दूर चल रही थी, थोड़ी देर में इनमें से चार  गाड़ियाँ "किलिंग ग्राउंड"  में पहुँच गयीं ।   तभी हमारे सैनिकों ने उन पर गोलीबारी शुरू कर दी और उन्हें ध्वस्त कर दिया।

जनपद पिथौरागढ (District Pithoragarh) के नायक मोहन सिंह के साहस की मिसाल : 

इसके बाद नायक मोहन सिंह ने देखा कि  काफिले से कुछ दूरी पर बची हुई दो गाड़ियाँ  इलाके से पीछे मुड़कर  भागने की कोशिश कर रही हैं। वह  तुरंत अपनी राइफल लेकर अपने मोर्चे से बाहर निकल पड़े और पीछे भागने की कोशिश करती गाड़ियों  के 200 मीटर पास आकर , पहले वाहन के चालक और सह-चालक पर फायरिंग कर दी, सटीक निशाने के कारण दोनों मौके पर ही ढेर हो गए । यह देखकर दूसरे वाहन के चालक और सह-चालक ने अपना वाहन छोड़कर वाहन के किनारों पर मोर्चा संभाल लिया और नायक मोहन सिंह पर गोली चलाने लगे । दोनों ओर से हो रही गोलीबारी में नायक मोहन सिंह घायल हो गए ।  उनके घावों से लगातार खून बह रहा था लेकिन अपनी जान की परवाह किए बिना वह लक्षित वाहन पर फायरिंग करते रहे और आगे बढ़ते रहे। उन्होंने गाड़ी के टायर पर फायर करके उनके भागने के मनसूबे पर पानी फेर दिया  और फिर गाड़ी के चालक पर फायर कर उसे मार गिराया।   अपने साहस , वीरता और तत्काल निर्णय लेने की क्षमता के कारण वह दुश्मन के  दो वाहनों को भागने से रोकने में सफल रहे  और अकेले  ही तीन दुश्मन सैनिकों को मार गिराया

नायक मोहन सिंह को मरणोपरांत उनके साहस, तत्काल निर्णय लेने की क्षमता , दृढ़ संकल्प, नेतृत्व क्षमता  और कर्तव्यनिष्ठा के लिए सेना मेडल (वीरता) से अलंकृत किया गया।


नायक मोहन सिंह, सेना मेडल (Sena Medal) (मरणोपरांत) का जीवन परिचय :  

नायक मोहन सिंह का जन्म 10 जनवरी 1942 को उत्तर प्रदेश के जनपद पिथौरागढ  (District Pithoragarh) के गांव बतौली (अब उत्तराखंड ) में श्रीमती जमुना देवी और श्री चन्द्र सिंह के यहाँ हुआ था । इन्होंने अपनी शिक्षा प्राथमिक पाठशाला, बतौली से पूरी की और 10 जनवरी 1962 को भारतीय सेना की ब्रिगेड ऑफ द गार्ड्स में भर्ती हुए और प्रशिक्षण के पश्चात उनकी पोस्टिंग  5 गार्ड्स रेजिमेंट में हुई। नायक मोहन सिंह के माता पिता और पत्नी श्रीमती सीता देवी का देहांत हो चुका है।  तीन माह पूर्व इनके छोटे बेटे महेंद्र सिंह का भी असमय निधन हो गया। इनके परिवार में बड़े बेटे शोबन सिंह तथा दो बेटियां  श्रीमती तारा देवी और श्रीमती माना मेहता हैं । दोनों बेटियों की शादी हो चुकी है।


वीरगति दिवस और नायक मोहन सिंह के परिवार की उपेक्षा : शहीद स्मारक 

55 साल बीत जाने के बाद भी नायक मोहन सिंह की प्रदर्शित वीरता (Virta) और साहस उपेक्षित है। आज तक न तो  उत्तर प्रदेश सरकार और न ही उत्तराखंड सरकार ने इनकी वीरता और बलिदान के सम्मान की सुधि ली है, जबकि इनका गृह राज्य उत्तराखंड है और  इनका परिवार बहुत पहले से लखनऊ में निवास कर रहा है। इनका नाम जिला सैनिक कल्याण कार्यालय लखनऊ की वीरता मेडल प्राप्त सैनिकों की सूची में भी अंकित है।  इनके बेटे शोबन सिंह का कहना है कि यह देखकर बहुत दुःख होता है कि युद्ध में तीन तीन दुश्मनों को मार गिराने वाले हमारे पिताजी के नाम पर आज तक न तो कोई शहीद स्मारक बनाया गया और न ही  किसी सड़क, पार्क, पुल और स्टेशन आदि का नामकरण किया गया । 

आज वीरगति दिवस पर जब हम अपने शहीदों को याद करते हैं, तो यह दुखद है कि उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश सरकारें आज तक नायक मोहन सिंह के सम्मान के लिए कोई स्थायी स्मारक या मान्यता स्थापित नहीं कर पाईं। उनके बेटे शोबन सिंह का कहना है कि पिता की वीरता और बलिदान की शहादत को उचित सम्मान नहीं मिला है। न तो उनके नाम पर कोई सड़क, पुल, पार्क या अन्य सार्वजनिक स्थल नामित किया गया हैयह हमारे समाज और प्रशासन की एक बड़ी कमी है कि ऐसे अमर शहीदों को सम्मान स्वरूप वह स्थान नहीं दिया जाता जिसके वे हकदार हैं।

📌 इस लेख को उत्तर प्रदेश के सूबेदार मेजर (आनरेरी) हरी राम यादव जी अयोध्या/लखनऊ (7087815074) द्वारा तैयार किया गया है।


वीरगति दिवस पर संदेश : 

वीरगति दिवस हमारे लिए केवल एक समारोह नहीं है, बल्कि यह हमें अपने इतिहास की वीर गाथाओं को याद दिलाने वाला दिन है। नायक मोहन सिंह जैसे शूरवीर हमें यह सिखाते हैं कि देश के लिए समर्पण और कर्तव्य से बढ़कर कोई धर्म नहीं। उनकी कहानी से नई पीढ़ी को गर्व और प्रेरणा मिलनी चाहिए। वीरों के बलिदान को नमन करते हुए यह जरूरी है कि सरकारें उनके सम्मान और यादगार के लिए ठोस कदम उठाएं। शहीदों की यादों को सजीव रखने के लिए स्मारक बनाए जाएं, ताकि उनकी वीरता सदैव हमारे दिलों में बसी रहे।


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